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Article Sep 12, 2026 107 views

उत्तर प्रदेश और बिहार की शिक्षा व्यवस्था: रटने की संस्कृति और रोजगार का संकट

भारत के दो सबसे बड़े और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य—उत्तर प्रदेश और बिहार—आज एक गंभीर और गहरे संकट से गुजर रहे हैं। वह संकट है शिक्षा की गिरती हुई गुणवत्ता का। दशकों से इन राज्यों में शिक्षा का मतलब केवल "तथ्यों को रटना" (Rote Learning) और परीक्षा पास करना बनकर रह गया है।

 

इस व्यवस्था में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking), तार्किक विश्लेषण और व्यावहारिक कौशल (Practical Skills) के लिए कोई जगह नहीं है। इसका सीधा और भयानक परिणाम यह हुआ है कि यहाँ के युवाओं की फौज डिग्रियां तो हाथ में लिए घूम रही है, लेकिन वे आधुनिक दुनिया की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं।

रटने पर आधारित शिक्षा के दुष्परिणाम

 

हमारे शिक्षण संस्थानों में आज भी दशकों पुरानी पद्धति चल रही है:

 

किताबी ज्ञान: छात्रों को केवलतालाबंदी, परिभाषाओं और पुराने सिद्धांतों को याद करने पर जोर दिया जाता है।

 

कौशल की कमी: स्कूल और कॉलेज से निकलने वाले युवाओं को कोडिंग, डेटा एनालिसिस, आधुनिक संवाद कौशल (Communication Skills) या समस्या-समाधान (Problem-solving) जैसी चीजें नहीं सिखाई जातीं।

 

रचनात्मकता का अंत: छात्रों से कभी यह नहीं पूछा जाता कि "क्यों" या "कैसे"। बस यह उम्मीद की जाती है कि वे किताबों में लिखी बातों को परीक्षा की कॉपी में ज्यों का त्यों उतार दें।

 

क्यों सरकारी नौकरियों के पीछे भागते हैं लाखों युवा?

 

जब शिक्षा आपको कोई व्यावहारिक कौशल नहीं सिखाती, तो सुरक्षित भविष्य की तलाश में युवा केवल एक ही रास्ते की तरफ देखते हैं—सरकारी नौकरी। इसके पीछे के मुख्य कारण हैं:

 

सामाजिक सुरक्षा और रुतबा: समाज में सरकारी नौकरी को स्थिरता, इज्जत और सुरक्षित भविष्य का पर्याय माना जाता है।

 

निजी क्षेत्र का अभाव: स्थानीय स्तर पर अच्छे कॉर्पोरेट या तकनीकी अवसर न होने के कारण युवाओं के पास सरकारी परीक्षाओं के अलावा कोई दूसरा बड़ा विकल्प नहीं बचता।

 

सालों की तैयारी का चक्र: लाखों युवा वर्षों तक क्लर्क, चपरासी या कांस्टेबल जैसी साधारण नौकरियों के लिए अपनी जवानी का सबसे कीमती समय कोचिंग संस्थानों में खपा देते हैं।

 

दिहाड़ी मजदूरी, रेहड़ी-पटरी और पलायन की मजबूरी

सरकारी नौकरियों के सीमित पदों और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण हर कोई सफल नहीं हो पाता। जब सिस्टम युवाओं को रोजगार योग्य नहीं बनाता, तो उनकी आर्थिक मजबूरी उन्हें कठोर यथार्थ की तरफ धकेल देती है:

 

महानगरों की ओर पलायन: लाखों युवा रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई, दिल्ली, सूरत और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों की तरफ रुख करते हैं।

 

दिहाड़ी मजदूरी: कौशल के अभाव में इन युवाओं को निर्माण स्थलों (Construction Sites) पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है।

 

स्ट्रीट फूड और छोटे काम: कई युवा शहरों की सड़कों पर ठेले लगाकर स्ट्रीट फूड बेचने, डिलीवरी बॉय बनने या अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने को मजबूर होते हैं, जहां आय बेहद अनिश्चित और कम होती है।

 

अब आगे क्या? (निष्कर्ष)

उत्तर प्रदेश और बिहार के युवाओं में प्रतिभा, ऊर्जा और मेहनत करने की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो बस शिक्षा के ढांचे को पूरी तरह से बदलने की। जब तक स्कूलों और कॉलेजों में रटन विद्या को बंद करके व्यावहारिक कौशल, तकनीकी शिक्षा और तार्किक सोच को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक यह चक्र यूं ही चलता रहेगा।

युवाओं को केवल परीक्षा पास करने वाली मशीन बनाने के बजाय आत्मनिर्भर और हुनरमंद बनाने का समय आ गया है।

अंगारा लाल

Content Creator & Artist

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